HCS-Nov: नवंबर २०१७ माह का अंतिम रविवार दिनांक २६ को था। इस दिन आश्रम में सायंकाल हनुमान चालीसा सत्संग का मासिक कार्यक्रम था। कार्यक्रम का शुभारम्भ दास बगीची के भक्तों द्वारा सुन्दर भजनों से हुआ।  पूज्य गुरूजी के व्यास पीठ पर पधारने और उनके स्वागत के उपरांत श्री गुलाब चंद व्यास जी ने एक सुन्दर भजन (हरि को भेज ले प्राणी) प्रस्तुत किया और फिर सबने हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया। उसके बाद पूज्य गुरूजी का सवा घंटे का प्रवचन हुआ, जिसमे उन्होंने चालीसा की २२वें चौपाई – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक कहु को डरना।। – पर प्रवचन किया।

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अपने उद्बोधन में पूज्य गुरूजी ने कहा की इस चौपाई में मनुष्य की दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रचलित आवश्यकताओं की पूर्ती के बारे में  गोस्वामीजी सूत्र प्रदान करते हैं। ये हैं सुख और सुरक्षा की प्राप्ति की इच्छा । वे कहते हैं की जो भी हनुमानजी की शरण में जाता है उसे सब प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं – सब सुख लहै तुम्हारी सरना। और जब आप हमारे रक्षक हैं तो हमें किसी बात का डर नहीं है, अर्थात हम सुरक्षित भी हो जायेंगे। ज्यादातर प्रत्येक मनुष्य इन्ही दो आवश्यकताओं के बारें में चिंतित होता रहता हैं और यथासंभव जुगाड़ भी करता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है की जीवन भर इस के लिए कार्य करने के बावजूद पर्याप्त सुख और सुरक्षा प्राप्त नहीं होती है। हमारा प्याला कुछ खाली बचा ही रहता है। अतः यह बिंदु अन्यन्त गंभीर और विचारणीय है। यह तो हम सबके जीवन का ही प्रश्न है। अब सोचना यह है की हम हनुमानजी की शरण में जाएँ तो हमें यह दोनों कैसे प्राप्त हो जायेंगे, क्या देवता लोग ही किसी के जीवन में किसी चीज़ के भाव-आभाव के हेतु होते हैं, क्या किसी गरीबी आदि के किये भगवान जिम्मेदार होते हैं, और अगर हम उनके शरण में चले गए तो वे अपना आदमी देख कर हमें सुखी आदि कर देते हैं। भले दुनियां में हम ऐसा देखते हैं की किसी नेता अथवा सेठ आदि के साथ जुड़ जाएँ तो वे भी हमारी आवश्यकताओं को देख लेते हैं, लेकिन ईश्वर के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं है। हम अपनी आँख ठीक से खोले तो सब को दिखता है की हम सब पर ईश्वर की अपार कृपा बरस रही है। कमी हमारे तरफ से है। हमारा अभाव और असुरक्षा हमारे मन से समस्याएं हैं, जिसे हमें ही ठीक करना होता है। ऐसे अनेकानेक दृष्टांत दुनिया में विराजमान हैं जिन्होंने अपने जीवन में अनेकानेक समस्यों और अभावों के बावजूद ने साहस और बुद्धिमत्ता से अपने जीवन में उत्कर्ष उत्पन्न कर लिया। इसलिए हमारी शरणागति ईश्वर के कर्तव्य का विधान और निरूपण नहीं है, बल्कि हमारे मन में कुछ परिवर्तन का सूचक है। अगर देवता लोग भी किसी की व्यक्तिगत सेवा और शुश्रुषा के वजह से ही हमारी देख भाल  करते हैं तो वे भी स्वार्थ और राग-द्वेष से कलुषित हो जायेंगे और वे भी सामान्य व्यक्तियों की तरह विकारी हो जायेंगे। अतः शरणागति कुछ हमारे अंदर ही परिवर्तन की सूचक और औषधि है।

हम लोग जिसके भी प्रति शरणागत होते हैं उसके गुणों का अपने अंदर समावेश होने लगता है। वे स्वाभाविक रूप से हमारे आदर्श होते हैं। हम लोग स्वाभाविक रूपा से उनके आचार और विचार का अनुकरण करने लगते हैं, और इस तरह से उनके गुणों का समावेश अपने अंदर होने लगता है, और यह ही सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। अब अगर हम हनुमानजी के प्रति समर्पित होते हैं तो उनके जैसी रामजी के प्रति शरणागति, साहस, निडरता, विनम्रता और बुद्धिमत्ता आदि देख कर, उसी रंग में रंगने लगते हैं। ईश्वर जब हम सब पर कृपा करते हैं तो हमें बिना कर्म के कोई फल नहीं देते हैं, वे हमें कर्म करने की कला और प्रेरणा देते हैं, और बाकि सब तो फिर स्वतः प्राप्त हो जाता है। अपने मन के परिवर्तन से वस्तुतः समस्या ही नहीं रहती है, और इस तरह से मनो हमारे प्रभु हम पर कृपा कर देते हैं। बस इसके लिए हमे शरणागति का रहस्य समझना चाहिए। वेदांत में जिसे निषेध कहते हैं उसे ही भक्ति शास्त्र में शरणागति कहते हैं। वेदांत कहता है की जब जीव-भाव का निषेध होता है तभी ब्रह्म-स्वरुप आत्मा का साक्षात्कार होता है। भक्ति शास्त्र शनै-शनै हमारे जीव-भाव को शिथिल करते हुए निवेदित करा देता है। अतः उसका रहस्य ठीक से जानना आवश्यक है।

शरणागति के छे अंग होते हैं। कहा गया है : अनुकुलस्य संकल्पः, प्रतिकुलस्य वर्जनं, राक्षिष्यति इति विश्वासः। गोप्तृत्वे वारणं तथा, आत्म-निक्षेप, कार्पण्ये, शरणागति षड्विधा। अर्थात हमारे इष्ट के लिए जो भी अनुकूल है उस अनुकूल कार्य को करने का निश्चय ; उन्हें जो भी अच्छा नहीं लगता है उस प्रतिकूल कार्य आदि से दूर रहना ; अपने मन में पूर्ण विश्वास होना की वे हमारी रक्षा करेंगे ; अपने इष्ट देवता को ही अपना पालक और स्वामी समझना ; उनके प्रति पूर्ण समर्पण होना, अर्थात जब भी हम उनकी सन्निधि में हों अथवा उनका स्मरण भी करें तब हमारे सब अभिमान समाप्त होते दिखाई पड़ें, अंदर तक एक हलकापना आ जाये, ये आत्म-निक्षेप है ; और अंतिम गुना सरलता और निरभिमानता का सूचक है। जिसमे भी ये गुण आते हैं वो ही शरणागति की साधना के पथ पे चलता है। ऐसा व्यक्ति न केवल अपने राग और द्वेष दूर करने लगता है बल्कि अभिमान को भी दूर करने लगता है। और साथ ही साथ अपने इष्ट के गुणों, ज्ञान, और भक्ति आदि को भी अपने अंदर समाविष्ट करने लगता है। इस तरह से उसका मन आमूल परिवर्तित हो जाता है। ऐसे मन में एक दिव्य शांति और सुख स्वाभाविक रूप से ही होता है। उसे किसी का भी डर नहीं रह जाता है, और वो अन्यन्त सुरक्षित महसूस करने लगता है। इस तरह से गोस्वामीजी की ये बात सार्थक हो जाती है की सब सुख लहे तम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। हमारे भगवान् सीधे कुछ न करने के द्वारा कितना कुछ कर देते है, भक्त इस परिवर्तन का श्रेय भी अपने भगवन को ही देता है, और ज्यादा विनम्र और शरणागत हो जाता है। मन जितना शांत और निर्मल होता है, उतनी ही बुद्धि और विकसित होने लगाती है, और वो वेदांत प्रतिपादित जीव-ब्रह्म के रहस्य गहरायी से समझने लगता है और अपने प्रफु से अंततः एक होक जीता है – ऐसे व्यक्ति को तो परम सुख का अक्षय भंडार मिल जाता है और वो पूर्ण सुरक्षित भी हो जाता है। पूज्य गुरूजी ने अनेकानेक सुन्दर एवं सरल दृष्टांतों से ये सब बातें बताई।

अंत में सबने मिलकर प्रेम से हनुमानजी की आरती करी तथा प्रसाद ग्रहण कर प्रस्थान किया।

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