HCS-Sept’17

HCS-Sept:  सितम्बर महीने का हनुमान चालीसा सत्संग का कार्यक्रम दिनांक  २४ सितम्बर को वेदांत आश्रम में आयोजित हुआ। कार्यक्रम का प्रारम्भ सूंदर भजनों  से हुआ, और फिर सबने हनुमान चालीसा का पाठ  किया। तदुपरांत  पूज्य गुरूजी ने हनुमान चालीसा की २१वीं  चौपाई पर अपना प्रवचन आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा की यह चौपाई जहाँ हनुमानजी रामजी के द्वार में बैठे हैं और उनकी आज्ञा के बाद ही कोई भक्त रामजी के दर्शन हेतु अंदर जा कर प्रभु के दर्शन कर पता है – का अर्थ बड़ा गूढ़ है। भगवन का निवास किसी कमरे अथवा मंदिर के अंदर मात्र नहीं होता है, वे तो कण-कण में व्याप्त हैं – फिर भी बगैर हनुमानजी जैसे संत की आज्ञा और आशीर्वाद के भगवन का दर्शन नहीं होता है।  इसका अर्थ यह है, की भगवन को  देखने की दॄष्टि होनी चाहिए तभी भगवन दिखते हैं। जो भगवन को देखने की दॄष्टि  देते हैं वे तो हम लोगों के गुरु होते हैं, अतः यहाँ हनुमानजी को गुरु रूप से बताया जा रहा है।  

भगवन के दर्शन के लिए एक तो हमें भगवन का ज्ञान होना चाहिए, और उससे पूर्व ज्ञान की प्राप्ति के लिए उसके लिए उत्कंठा, इच्छा और उत्साह होना चाहिए। इन सब चीजों का होना भक्ति का लक्षण है।  हनुमानजी एक गुरु की तरह बैठ के शास्त्रों का ज्ञान तो नहीं देते हैं, लेकिन वे हम लोगों के अंदर भक्ति जरूर उन्पन्न कर देते हैं। नारद भक्ति सूत्र में उन्हें भक्ति का एक आचार्य कहा गया है।  भक्ति हमें भगवत ज्ञान हेतु पात्रता प्रदान करती है।  हनुमानजी अपने आचरणों से हमें भक्ति का उपदेश देते हैं।  किसी भी व्यक्ति को भगवत भक्ति के लिए कैसे अपने आप को तैयार करना चाहिए, उस विषय पर पूज्य गुरूजी ने अपने प्रवचन में विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने भक्ति की प्राप्ति हेतु राम जी और शबरी के उस प्रसंग की चर्चा करि – जहाँ रामजी खुद भक्ति की प्राप्ति हेतु उपदेश देते हैं।  

भक्ति की प्राप्ति हेतु उन्होंने नवधा भक्ति की विस्तार से चर्चा करी।  

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प्रवचन 

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